Gujarat के निकाय चुनाव में इस बार एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है—अंकिता परमार। सोशल मीडिया पर लोकप्रिय अंकिता को भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव मैदान में उतारा है। टिकट की घोषणा होते ही पार्टी के भीतर विरोध की खबरें भी सामने आने लगी हैं।
अंकिता परमार इंस्टाग्राम और दूसरे प्लेटफॉर्म पर काफी सक्रिय रही हैं। उनके लाखों फॉलोअर्स बताए जाते हैं और युवा वर्ग में उनकी पहचान मजबूत मानी जाती है। माना जा रहा है कि पार्टी ने नए मतदाताओं और शहरी युवाओं तक पहुंच बनाने के लिए यह दांव खेला है।
लेकिन इस फैसले से पार्टी के कुछ स्थानीय नेताओं और पुराने कार्यकर्ताओं में नाराजगी दिखाई दे रही है। उनका कहना है कि वर्षों से संगठन में मेहनत करने वालों को नजरअंदाज कर अचानक नए चेहरे को
Gujarat के निकाय चुनाव में इस बार एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है—अंकिता परमार। सोशल मीडिया पर लोकप्रिय अंकिता को भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव मैदान में उतारा है। टिकट की घोषणा होते ही पार्टी के भीतर विरोध की खबरें भी सामने आने लगी हैं।
अंकिता परमार इंस्टाग्राम और दूसरे प्लेटफॉर्म पर काफी सक्रिय रही हैं। उनके लाखों फॉलोअर्स बताए जाते हैं और युवा वर्ग में उनकी पहचान मजबूत मानी जाती है। माना जा रहा है कि पार्टी ने नए मतदाताओं और शहरी युवाओं तक पहुंच बनाने के लिए यह दांव खेला है।
लेकिन इस फैसले से पार्टी के कुछ स्थानीय नेताओं और पुराने कार्यकर्ताओं में नाराजगी दिखाई दे रही है। उनका कहना है कि वर्षों से संगठन में मेहनत करने वालों को नजरअंदाज कर अचानक नए चेहरे को मौका दिया गया। कई कार्यकर्ता मानते हैं कि निकाय चुनावों में स्थानीय जुड़ाव और जमीनी काम ज्यादा मायने रखता है, केवल लोकप्रियता नहीं।
यही वजह है कि कुछ इलाकों में असंतोष खुलकर सामने आया है। हालांकि पार्टी नेतृत्व इसे सामान्य प्रक्रिया बता रहा है। नेताओं का कहना है कि टिकट वितरण में कई बार कठिन फैसले लेने पड़ते हैं और सभी कार्यकर्ताओं को मिलकर चुनाव लड़ना चाहिए।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला भाजपा की बदलती चुनावी रणनीति को दिखाता है। अब पार्टियां सिर्फ पारंपरिक नेताओं पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं, बल्कि सोशल मीडिया प्रभाव रखने वाले चेहरों को भी मौका दे रही हैं। डिजिटल पहचान को वोट में बदलने की कोशिश अब खुलकर दिखाई दे रही है।
हालांकि चुनाव मैदान सोशल मीडिया से अलग होता है। यहां लोगों से सीधा संपर्क, स्थानीय मुद्दों की समझ और संगठन की ताकत ज्यादा काम आती है। इसलिए अंकिता परमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी ऑनलाइन लोकप्रियता को जमीनी समर्थन में बदलने की होगी।
फिलहाल गुजरात निकाय चुनाव में यह सीट खास चर्चा में आ गई है। एक तरफ नया चेहरा है, दूसरी तरफ पार्टी के भीतर उठता विरोध। अब देखना होगा कि यह फैसला बीजेपी के लिए फायदा बनता है या मुश्किल।