सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार की राजनीति अचानक तेज हो गई है। सत्ता परिवर्तन के साथ ही प्रशांत किशोर की सक्रियता भी बढ़ती नजर आ रही है। लगातार बयान, जनसभाएं, बैठकों का सिलसिला और सरकार पर सीधा हमला—इन सबने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है।
प्रशांत किशोर लंबे समय से बिहार में खुद को पारंपरिक दलों के विकल्प के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। जनसुराज अभियान के जरिए वे गांव-गांव जाकर लोगों से संवाद कर चुके हैं। लेकिन अब सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद उनकी रफ्तार और तेज दिखाई दे रही है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि जब भी सत्ता बदलती है, विपक्ष और नए दावेदारों के लिए मौका बनता है। जनता नई सरकार को परख रही होती है और विपक्ष
सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार की राजनीति अचानक तेज हो गई है। सत्ता परिवर्तन के साथ ही प्रशांत किशोर की सक्रियता भी बढ़ती नजर आ रही है। लगातार बयान, जनसभाएं, बैठकों का सिलसिला और सरकार पर सीधा हमला—इन सबने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी है।
प्रशांत किशोर लंबे समय से बिहार में खुद को पारंपरिक दलों के विकल्प के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। जनसुराज अभियान के जरिए वे गांव-गांव जाकर लोगों से संवाद कर चुके हैं। लेकिन अब सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद उनकी रफ्तार और तेज दिखाई दे रही है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि जब भी सत्ता बदलती है, विपक्ष और नए दावेदारों के लिए मौका बनता है। जनता नई सरकार को परख रही होती है और विपक्ष अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश करता है। ऐसे समय में प्रशांत किशोर रोजगार, शिक्षा, भ्रष्टाचार और प्रशासन जैसे मुद्दों को सामने रखकर खुद को गंभीर विकल्प बताना चाहते हैं।
एक वजह यह भी मानी जा रही है कि सम्राट चौधरी के आने से बिहार के राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। जातीय और सामाजिक आधार पर नए समीकरण बनने की संभावना है। ऐसे में प्रशांत किशोर उन मतदाताओं तक पहुंच बनाना चाहते हैं जो पुराने दलों से नाराज हैं।
हाल के दिनों में उनकी सभाओं में भीड़, सोशल मीडिया पर सक्रियता और सरकार पर तीखे सवालों ने यह साफ किया है कि वे आने वाले चुनावों को लेकर पूरी तैयारी में हैं। वे केवल टिप्पणी करने तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि राजनीतिक ताकत के रूप में खुद को स्थापित करना चाहते हैं।
हालांकि उनके समर्थकों का कहना है कि वे पहले से ही जनता के बीच सक्रिय थे और इसे किसी एक नेता के मुख्यमंत्री बनने से जोड़ना सही नहीं है। लेकिन राजनीति में समय बहुत कुछ तय करता है, और इस समय उनकी बढ़ी सक्रियता कई संकेत दे रही है।
फिलहाल बिहार की राजनीति में मुकाबला दिलचस्प होता दिख रहा है। एक तरफ नई सरकार है, दूसरी तरफ प्रशांत किशोर जैसे चेहरे अपनी जगह बनाने में जुटे हैं। आने वाले महीनों में तस्वीर और साफ होगी।